बस यूं ही!!

कुछ सिलवटें अनछूही सी,

कुछ करवटें अधमुँही सी,

आँखों मैं सपने हज़ार,

सुकून का है इंतज़ार,


पर क्या सुकून मेहमान है बसअरमानो का?

क्या उनके पूरे होने भर से है सुकून का नाता?


सोचने बैठूं तो घंटो रह जाती हूँ बैठी युहीं,

याद आते हैं वो बचपन के दिन,


जब,


सबकुछ कितना सरल और सादा सा था,

अरमान ऐसे की आसमान कम था,

ख्वाहिशे ऐसी जो मंजिलों की मोहताज न थी,


जीवन बदला, सपने बदले, पर क्या बदल पायी हूँ मैं?


दुनिया की भीड़ में चलते, सबके कंधे से कन्धा मिलाने की कोशिश करते,

दिल के झीने से एक कोने में,

मैं वो ही हूँ !!


गुमसुम,

शांत,


पर भरी हुई आशाओ से,

बिलकुल वो ही मैं❤️




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